शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

नीम की पत्तियाँ

बहुत निभा ली यारी हमने चलो अब ये झूठा रिश्ता निभा लूँ,
झूठ कह कर जो कहो तो सच की तरह ही मैं भी सिर उठा लूँ ?
जो न समझो तुम बात मेरी तो क्या इसमें भी कसूर मेरा है,
अब लोगों की तरह मैं भी जाकर ओलों में क्या सर मुण्डा लूँ ?
जो हो गया सो हो गया अब क्या रोना और क्या पछताना,
ज़ख्मों को कुरेद कुरेद कर अब क्या मैं उसे नासूर बना लूँ ?
बिना किसी शर्त के मानी है हर बात हमने तुम्हारी अब तक,
गलती की नहीं फिर भी तुम चाहो तो अपनी नज़रें झुका लूँ I
चोट गहरी है, ज़रा वक़्त लगेगा चेहरे पर मुस्कराहट आने में,
चाहने से तुम्हारे खोखली हंसी का क्या मैं भी ठहाका लगा लूँ ?
दिल में बस कर अपना बनकर अपनों ने ही तोड़ा है दिल,
दिल तो चाहता है एक बार से फिर दिल की बाज़ी लगा लूँ I
लिखा रहने दो किताबों में कि सच कहता है आइना हमेशा,
दिल करता है सच्चाई के नाम पर नीम की पत्तियाँ चबा लूँ I
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गुरचरन मेह्ता

रविवार, 11 अगस्त 2013

अब समझ आया

मोहब्बत है जिन्दगी में सब कुछ मेरे हुजुर – अब समझ आया I
प्यार क्या होता है, हुए हैं वो हमसे ज़रा दूर – अब समझ आया II
तुम्हारी वफाओं का भरपूर फायदा उठाया हमने,
समझे, लाचारी क्या है जब हुए हम मजबूर – अब समझ आया I
प्यार के पल गंवा दिए हमने जाने क्यूँ,
गिरें ज़मीं पर, ओर उतरा सुरूर – अब समझ आया I
खंजर लिए देखा दोस्तों को तो याद आया,
क्यूँ कहते थे वो हो न जाना मशहूर – अब समझ आया I
पता चले जिन्दगी के मायने जिन्दगी के बाद,
कुछ उनका तो हमारा भी था कुसूर – अब समझ आया I
छुना चाहते थे आसमां, तोड़ना चाहते थे तारे,
पर क्या करते हम , खट्टे थे अंगूर – अब समझ आया I
जो बीत गए उन लम्हों की कसक तो याद रहेगी,
कहते थे एक दिन समझ में आयेगा जरुर – अब समझ आया I
बहाना बनाना, समय पर न आना, चुभन दे गया “चरन”
तुम तो थे मशरूफ, हम समझ बैठे मगरूर – अब समझ आया II
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